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Monday, 7 March 2016

Bhavnath Fair In Gujarat Mahashivaratri Fastival

Bhavnath Fair
The vibrancy and charm of Bhavnath fair attracts a multitude of tourists and devotees of Shiva and make Junagarh as their second home in their will to become a part of mammoth experience. The ancient city of Junagarh is situated in the valley of Girnar Parvat & Datar hills.




Bhavnath Fair is held every year at the Bhavnath Mahadev Temple near Damodar Kund, at the foot of Girnar Mountain. The fair falls on the same day as the extravagant and much famed Maha Shivratri.
Bhavnath fair is dedicated to Lord Shiva and a lot of celebrations happens in the Shiva temples. Thousands of Naga Sadhus visit here and are the main attraction that makes this fair distinct from others.
The scene there is amazing and watching them is a new rather mysterious experience.
The Naga Sadhus are practically nude. They believe that the whole world is their home and sky is like a cover so they do not need clothes to cover their bodies as they are sky dressed. They have accepted nakedness as part of their way of life.
All the Naga babas in the vicinity gathers at the time of maha puja on the fair site. They come seated on the elephants, holding flags in their hand and blowing conch shells, tungis, and turis; the environment is echoed with their sounds. The forward movement of the procession to the temple initiates an emotive religious ceremony.


The marching of Naga babas through the darkness of late evening (after 9 p.m.) of Mahashivratri is the grand attraction of this fair. The religious procession of Naked Sadhus features an exhibition of sword fight practices and other interesting activities. Only three akhadas (groups of sadhus) participate in the display. The procession reaches its end finally at 12.00 in midnight at Bhavnath temple’s Mrugi kund (tank) where they take bath.
It is a five day fair which concludes on the annual Mahashivaratri day. Grand puja of lord Shiva is conducted at midnight of Maha Shivratri.
Pilgrims take 7 meter long parikrama of the holy hills of Girnar, before going to the fair. About one lakh people, mainly from Gujarat and Marwad, claded in bright colour come here every year. Special temporarily set stalls sell idols, rosaries and mouth-watering sweets.
Devotees believe that Lord Shiva himself visits the shrine on this auspicious occasion. The nine immortal nathas and eighty-four siddhas who are said to be homed at Girnar also visit the temple as invisible spirit during Mahashivaratri.
The organizers provide free meals to visitors. The atmosphere is rhythmic. The musical notes of local folk music can be sensed in air and the view of beautiful folk dances as bhavai in colourful dresses is awesome. The handicraft & dazzling ornaments worn by devotees and tribes that come to Bhavnath Fair captures the senses of every mankind.
Richness of our culture is on display during the whole mela as it meets ourself with our roots, customs, practices, ritual, belief. This fair is a real beauty, equally passionate, intense and mystic. Via : facebook status
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Wednesday, 2 December 2015

Enjoy life how to live? Enjoy life EveryDay


जीवन में आने वाली हर चुनौती को स्वीकार करे। अपनी पसंद की चीजों के लिये खर्चा करें।...... इतना हंसिये के पेट दर्द हो जाये।.... आप कितना भी बुरा नाचते हो , फिर भी नाचिये।...... उस खुशी को महसूस किजिये।..... फोटोज् के लिये पागलों वाली पोज् दिजिये।...... बिल्कुल छोटे बच्चे बन जाइये। हर पल को खुशी से जीने को ही जिंदगी कहते है। "जिंदगी है छोटी," हर पल में खुश हूँ,
"काम में खुश हूँ ," आराम में खुश हूँ , "आज पनीर नहीं," दाल में ही खुश हूँ, "आज गाड़ी नहीं," पैदल ही खुश हूँ , "जिस को देख नहीं सकता," उसकी आवाज से ही खुश हूँ , "जिसको पा नहीं सकता," उसको सोच कर ही खुश हूँ ,"बीता हुआ कल जा चुका है," उसकी मीठी याद में ही खुश हूँ , "आने वाले कल का पता नहीं," इंतजार में ही खुश हूँ, "हंसता हुआ बीत रहा है पल," आज में
ही खुश हूँ , "जिंदगी है छोटी," हर पल में खुश हूँ , अगर दिल को छुआ, तो जवाब देना,
वरना बिना जवाब के भी खुश हूँ..!!
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Friday, 27 November 2015

India State CM List 2016 Updated - राज्य मुख्यमंत्री


राज्य]  ----      [मुख्यमंत्री] {Updated }}
[01] महाराष्ट्र-- देवेंद्र फड़नवीस
[02] हरियाणा-- मनोहरलाल खट्टर
[03] झारखण्ड —- श्री रघुवर दास
[04] जम्मू और कश्मीर — मुफ़्ती मोहम्मद सईद
[05] हिमाचल प्रदेश —– वीरभद्र सिंह
[06] कर्नाटक —– के. सिद्धारमैया
[07] केरल —— ओमान चांडी
[08] मध्य प्रदेश -- शिवराज सिंह चौहान
[09] तेलंगाना -- चंद्रशेखर राव
[10] आंध्र प्रदेश --- चन्द्रबाबू नायडू
[11] अरुणाचल प्रदेश —- नाबम टुकी
[12] असम —- तरुण कुमार गगोई
[13] बिहार —– नीतिस कुमार
[14] छत्तीसढ —- डॉ.रमन सिंह
[15] नागालैण्ड —– टी आरजेलियांग
[16] ओडिशा —– नवीन पटनायक
[17] मिज़ोरम -- ललथानवाला
[18] पंजाब--- प्रकाश सिंह बादल
[19] राजस्थान --- वसुंधरा राजेसिंधिया
[20] सिक्किम --- पवन कुमारचामलिंग
[21] तमिलनाडु–- जयललिता
[22] त्रिपुरा- - - माणिक सरकार
[23] उत्तराखण्ड —— हरीश रावत
[24] उत्तर प्रदेश--- अखिलेश यादव
[25] पश्चिम बंगाल —— ममता बनर्जी,
[26] गुजरात —– आनंदी बेन पटेल
[27] मणिपुर —– ओकराम इबोईसिंह
[28] मेघालय —– मुकुल संगमा
[29] दिल्ली — अरविन्द केजरीवाल
[30] गोआ —– लक्ष्मीकांत परसकर
[31] पॉण्डिचेरी --- एन.रंगास्वामी
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Thursday, 5 November 2015

Some interesting facts about Maharana Pratap


महाराणा प्रताप के बारे में कुछ रोचक तथ्य
1.महाराणा प्रताप एक ही झटके में घोड़े समेत दुश्मन सैनिक को काट डालते थे।
2.जब इब्राहिम लिंकन भारत दौरे पर आ रहे थे तब उन्होने अपनी माँ से पूछा कि हिंदुस्तान से आपके लिए क्या लेकर अाए| तब माँ का जवाब मिला ” उस महान देश की वीर भूमि हल्दी घाटी से एक मुट्ठी धूल लेकर आना जहाँ का राजा अपनी प्रजा के प्रति इतना वफ़ादार था कि उसने आधे हिंदुस्तान के बदले अपनी मातृभूमि को चुना ” बदकिस्मती से उनका वो दौरा रद्द हो गया था | “बुक ऑफ़ प्रेसिडेंट यु एस ए ‘ किताब में आप ये बात पढ़ सकते है |
3.महाराणा प्रताप के भाले का वजन 80 किलो था और कवच का वजन 80 किलो कवच , भाला, ढाल, और हाथ में तलवार का वजन मिलाये तो 207 किलो
4.आज भी महाराणा प्रताप की तलवार कवच आदि सामान उदयपुर राज घराने के संग्रहालय में सुरक्षित हैं |
5.अकबर ने कहा था कि अगर राणा प्रताप मेरे सामने झुकते है तो आधा हिंदुस्तान के वारिस वो होंगे पर बादशाहत अकबर की ही रहेगी |
6.हल्दी घाटी की लड़ाई में मेवाड़ से 20000 सैनिक थे और अकबर की ओर से 85000 सैनिक युद्ध में सम्मिलित हुए |
7.राणाप्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर भी बना जो आज हल्दी घाटी में सुरक्षित है |
8.महाराणा ने जब महलो का त्याग किया तब उनके साथ लुहार जाति के हजारो लोगो ने भी घर छोड़ा और दिन रात राणा कि फौज के लिए तलवारे बनायीं इसी समाज को आज गुजरात मध्यप्रदेश और राजस्थान में गड़लिया लोहार कहा जाता है नमन है ऐसे लोगो को |
9.हल्दी घाटी के युद्ध के 300 साल बाद भी वहाँ जमीनों में तलवारें पायी गयी। आखिरी बार तलवारों का जखीरा 1985 में हल्दी घाटी में मिला |
10.महाराणा प्रताप अस्त्र शस्त्र की शिक्षा जैमल मेड़तिया ने दी थी जो 8000 राजपूतो को लेकर 60000 से लड़े थे। उस युद्ध में 48000 मारे गए थे जिनमे 8000 राजपूत और 40000 मुग़ल थे |
11.राणा प्रताप के देहांत पर अकबर भी रो पड़ा था |
12.मेवाड़ के आदिवासी भील समाज ने हल्दी घाटी में अकबर की फौज को अपने तीरो से रौंद डाला था वो राणाप्रताप को अपना बेटा मानते थे और राणा जी बिना भेद भाव के उन के साथ रहते थे आज भी मेवाड़ के राजचिन्ह पर एक तरफ राजपूत है तो दूसरी तरफ भील |
13.राणा का घोडा चेतक महाराणा को 26 फीट का दरिया पार करने के बाद वीर गति को प्राप्त हुआ | उसकी एक टांग टूटने के बाद भी वह दरिया पार कर गया। जहा वो घायल हुआ वहीं आज खोड़ी इमली नाम का पेड़ है जहाँ मरा वहाँ मंदिर है |
14.राणा का घोडा चेतक भी बहुत ताकतवर था उसके मुँह के आगे हाथी की सूंड लगाई जाती थी यह हेतक और चेतक नाम के दो घोड़े थे |
15.मरने से पहले महाराणा ने खोया हुआ 85 % मेवाड फिर से जीत लिया था *सोने चांदी और महलो को छोड़ वो 20 साल मेवाड़ के जंगलो में घूमे |
16.महाराणा प्रताप का वजन 110 किलो और लम्बाई 7’5” थी, दो म्यान वाली तलवार और 80 किलो का भाला रखते थे हाथ में |
17.मेवाड़ राजघराने के वारिस को एकलिंग जी भगवान का दीवान माना जाता है |
18 . छत्रपति शिवाजी भी मूल रूप से मेवाड़ से ताल्लुक रखते थे वीर शिवाजी के परदादा उदयपुर महाराणा के छोटे भाई थे |
19.अकबर को अफगान के शेख रहमुर खान ने कहा था अगर तुम राणा प्रताप और जयमल मेड़तिया को अपने साथ मिला लो तो तुम्हे विश्व विजेता बनने से कोई नहीं रोक सकता पर इन दोनों वीरो ने जीते जी कभी हार नहीं मानी |
20.नेपाल का राज परिवार भी चित्तौड़ से निकला है दोनों में भाई और खून का रिश्ता है |
21.मेवाड़ राजघराना आज भी दुनिया का सबसे प्राचीन राजघराना है।
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Sunday, 23 August 2015

Bholenath Ki Amarnath Gufa Ka Rahasya - अमरनाथ गुफा से जुडे अनजाने रहस्य

आदि देव महादेव स्वयंभू पशुपति नीलकंठ भगवान आशुतोष शंकर भोले भंडारी को सहस्त्रों नामों से स्तुति कर पुकारा जाता है। शास्त्रों में जगह-जगह पर भगवान शिव के महात्म्य का वर्णन मिलता है। ऋग्वेद में भी शिवजी का गुणगान मिलता है। श्री अमरनाथ धाम एक ऐसा शिव धाम है जिसके संबंध में मान्यता है कि भगवान शिव साक्षात श्री अमरनाथ गुफा में विराजमान रहते हैं।

बाबा बर्फानी से जुडे हैरान कर देने वाले तथ्य -
धार्मिक व ऐतिहासिक दृष्टी से अति महत्वपूर्ण श्री अमरनाथ यात्रा को कुछ शिव भक्त स्वर्ग की प्राप्ति का माध्यम बताते हैं तो कुछ लोग मोक्ष प्राप्ति का। श्री अमरनाथ यात्रा हमारी एकता का भी प्रतीक माना जता है। पावन गुफा में बर्फीली बूंदों से बनने वाला हिमशिवलिंग ऐसा दैवी चमत्कार है जिसे देखने के लिए हर कोई लालायित रहता है और जो देख लेता है वो धन्य हो जाता है।

भारत के कोने-कोने से और विदेशों से असंख्य शिव भक्त लगभग 14 हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित श्री अमरनाथ की गुफा में प्रकृति के इस चमत्कार के दर्शन करने के लिए अनेकों बाधाएं पार करके भी पहुंचते हैं। श्री अमरनाथ गुफा में स्थित पार्वती पीठ 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि यहां भगवती सती का कंठ भाग गिरा था।

कश्मीर घाटी में स्थित पावन श्री अमरनाथ गुफा प्राकृतिक है। यह पावन गुफा लगभग 160 फुट लम्बी, 100 फुट चौड़ी और काफी ऊंची है। कश्मीर में वैसे तो 45 शिव धाम, 60 विष्णु धाम, 3 ब्रह्मा धाम, 22 शक्ति धाम, 700 नाग धाम तथा असंख्य तीर्थ हैं पर श्री अमरनाथ धाम का सबसे अधिक महत्व है।

काशी में लिंग दर्शन एवं पूजन से दस गुणा, प्रयाग से सौ गुणा, नैमिषारण्य तथा कुरुक्षेत्र से हजार गुणा फल देने वाला श्री अमरनाथ स्वामी का पूजन है। देवताओं की हजार वर्ष तक स्वर्ण पुष्प मोती एवं पट्टआ वस्त्रों से पूजा का जो फल मिलता है, वह श्री अमरनाथ की रसलिंग पूजा से एक ही दिन में प्राप्त हो जाता है।

श्री अमरनाथ गुफा में शिव भक्त प्राकृतिक हिमशिवलिंग के साथ-साथ बर्फ से ही बनने वाले प्राकृतिक शेषनाग, श्री गणेश पीठ व माता पार्वती पीठ के भी दर्शन करते हैं। प्राकृतिक रूप से प्रति वर्ष बनने वाले हिमशिवलिंग में इतनी अधिक चमक विद्यमान होती है कि देखने वालों की आंखों को चकाचौंध कर देती है।

हिमशिवलिंग पक्की बर्फ का बनता है जबकि गुफा के बाहर मीलों तक सर्वत्र कच्ची बर्फ ही देखने को मिलती है। मान्यता यह भी है कि गुफा के ऊपर पर्वत पर श्री राम कुंड है। भगवान शिव ने माता पार्वती को सृष्टिआ की रचना इसी अमरनाथ गुफा में सुनाई थी।

गुफा की खोज -
इस गुफा की खोज बूटा मलिक नामक एक बहुत ही नेक और दयालु एक मुसलमान गडरिए ने की थी। वह एक दिन भेड़ें चराते-चराते बहुत दूर निकल गया। एक जंगल में पहुंचकर उसकी एक साधू से भेंट हो गई। साधू ने बूटा मलिक को कोयले से भरी एक कांगड़ी दे दी। घर पहुंचकर उसने कोयले की जगह सोना पाया तो वह बहुत हैरान हुआ। उसी समय वह साधू का धन्यवाद करने के लिए गया परन्तु वहां साधू को न पाकर एक विशाल गुफा को देखा। उसी दिन से यह स्थान एक तीर्थ बन गया।

एक बार देवर्षि नारद कैलाश पर्वत पर भगवान शंकर के दर्शनार्थ पधारे। भगवान शंकर उस समय वन विहार को गए हुए थे और पार्वती जी वहां विराजमान थीं। पार्वती जी ने देवर्षि के आने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा-देवी! भगवान शंकर, जो हम दोनों से बड़े हैं, के गले में मुंडमाला क्यों है? भगवान शंकर के वहां आने पर यही प्रश्र पार्वती जी ने उनसे किया। भगवान शंकर ने कहा-हे पार्वती! जितनी बार तुम्हारा जन्म हुआ है, उतने ही मुंड मैंने धारण किए हैं।

पार्वती जी बोलीं -
मेरा शरीर नाशवान है, मृत्यु को प्राप्त होता है परन्तु आप अमर हैं, इसका कारण बताने का कष्ट करें। भगवान शंकर ने कहा -यह सब अमरकथा के कारण है। इस पर पार्वती जी के हृदय में भी अमरत्व प्राप्त करने की भावना पैदा हो गई और वह भगवान से कथा सुनाने का आग्रह करने लगीं।


भगवान शंकर ने बहुत वर्षों तक टालने का प्रयत्न किया परन्तु अंतत: उन्हें अमरकथा सुनाने को बाध्य होना पड़ा। अमरकथा सुनाने के लिए समस्या यह थी कि कोई अन्य जीव उस कथा को न सुने। इसलिए शिव जी पांच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्रि) का परित्याग करके इन पर्वत मालाओं में पहुंच गए और श्री अमरनाथ गुफा में पार्वती जी को अमरकथा सुनाई।

श्री अमरकथा गुफा की ओर जाते हुए वह सर्वप्रथम पहलगाम पहुंचे, जहां उन्होंने अपने नंदी (बैल) का परित्याग किया। उसके बाद चंदनबाड़ी में अपनी जटा से चंद्रमा को मुक्त किया। शेषनाग नामक झील पर पहुंच कर उन्होंने गले से सर्पों को भी उतार दिया। प्रिय पुत्र श्री गणेश जी को भी उन्होंने महागुणस पर्वत पर छोड़ देने का निश्चय किया। फिर पंचतरणी नामक स्थान पर पहुंच कर शिव भगवान ने पांचों तत्वों का परित्याग किया।

इसके पश्चात ऐसी मान्यता है कि शिव-पार्वती ने इस पर्वत शृंखला में तांडव किया था। तांडव नृत्य वास्तव में सृष्टिआ के त्याग का प्रतीक माना गया। सब कुछ छोड़ अंत में भगवान शिव ने इस गुफा में प्रवेश किया और पार्वती जी को अमरकथा सुनाई। किंवदंती के अनुसार रक्षा बंधन की पूर्णिमा के दिन जो सामान्यत: अगस्त के बीच में पड़ती है, भगवान शंकर स्वयं श्री अमरनाथ गुफा में पधारते हैं।

ऐसा भी ग्रंथों में लिखा मिलता है कि भगवान शिव इस गुफा में पहले पहल श्रावण की पूर्णिमा को आए थे इसलिए उस दिन को श्री अमरनाथ की यात्रा को विशेष महत्व मिला। रक्षा बंधन की पूर्णिमा के दिन ही छड़ी मुबारक भी गुफा में बने हिमशिवलिंग के पास स्थापित कर दी जाती है।

श्री अमरनाथ गुफा में बर्फ से बने शिवलिंग की पूजा होती है। इस सम्बन्ध में अमरेश महादेव की कथा भी मशहूर है। इसके अनुसार आदिकाल में ब्रह्म, प्रकृति, अहंकार, स्थावर (पर्वतादि) जंगल (मनुष्य) संसार की उत्पत्ति हुई। इस क्रमानुसार देवता, ऋषि, पितर, गंधर्व, राक्षस, सर्प, यक्ष, भूतगण, दानव आदि की उत्पत्ति हुई।

इस तरह नए प्रकार के भूतों की सृष्टिआ हुई परन्तु इंद्रादि देवता सहित सभी मृत्यु के वश में हुए थे। देवता भगवान सदाशिव के पास आए क्योंकि उन्हें मृत्यु का भय था। भय से त्रस्त सभी देवताओं ने भगवान भोलेनाथ की स्तुति कर मृत्यु बाधा से मुक्ति का उपाय पूछा। भोलेनाथ स्वामी बोले-मैं आप लोगों की मृत्यु के भय से रक्षा करूंगा। कहते हुए सदाशिव ने अपने सिर पर से चंद्रमा की कला को उतार कर निचोड़ा और देवगणों से बोले, यह आप लोगों के मृत्युरोग की औषधि है

उस चंद्रकला के निचोडऩे से पवित्र अमृत की धारा बह निकली। चंद्रकला को निचोड़ते समय भगवान सदाशिव के शरीर से अमृत बिंबदु पृथ्वी पर गिर कर सूख गए। पावन गुफा में जो भस्म है, वह इसी अमृत ङ्क्षबदु के कण है। सदाशिव भगवान देवताओं पर प्रेम न्यौछावर करते समय स्वयं द्रवीभूत हो गए और देवताओं से कहा-देवताओ! आपने मेरा बर्फ का लिंग शरीर इस गुफा में देखा है। इस कारण मेरी कृपा से आप लोगों को मृत्यु का भय नहीं रहेगा।

अब आप यहीं अमर होकर शिव रूप को प्राप्त हो जाएं। आज से मेरा यह अनादि लिंग शरीर तीनों लोकों में अमरेश के नाम से विख्यात होगा। भगवान सदाशिव देवताओं को ऐसा वर देकर उस दिन से लीन होकर गुफा में रहने लगे। भगवान सदाशिव महाराज ने देवताओं की मृत्यु का नाश किया, इसलिए तभी से उनका नाम अमरेश्वर प्रसिद्ध हुआ है।

मनुष्य श्री अमरनाथ जी की यात्रा करके शुद्धि को प्राप्त करता है तथा शिवलिंग के दर्शनों से भीतर-बाहर से शुद्ध होकर धर्म, अर्थ, काम वचन तथा मोक्ष को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। अमरनाथ धाम पहुंचना सौभाग्य की बात है। वहां भगवान शिव के दर्शन करने से सर्वसुख की प्राप्ति होती है। बाबा बर्फानी की गुफा में प्रवेश करके भगवान शिव की साक्षात उपस्थिति का एहसास होता है।

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Tuesday, 28 July 2015

हमने एक इतिहास बनाने वाले को खो दिया है, पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम नहीं रहे


हमने भारत के 11वें राष्ट्रपति को खो दिया है
हमने भारत के होनहार बेटे को खो दिया है
हमने आज भारत के मिसाइल मैन को खो दिया है
हमने A P J अब्दुल कलाम को खो दिया है

 पूर्व राष्ट्रपति और
अब्दुल कलाम आजाद का निधन हो गया है।
वह शिलांग में एक लेक्चर देने के लिए गए थे। 83
साल के कलाम की शिलांग में आईआईएम में
लेक्चर देने गए थे लेकिन वहीं पर भाषण देने के
दौरान वह बेहोश होकर गिर पड़े।
जानकारी के अनुसार, उन्हें वहां के ही एक
अस्पताल में 7 बजे भर्ती कराया गया था।
सूत्रों ने बताया कि उनकी ब्लड प्रेशर और
दिल की धड़कन एकदम से कम हो गई थी
जिसके बाद उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया
गया।
18 जुलाई, 2002 को डॉक्टर कलाम को नब्बे
प्रतिशत बहुमत द्वारा 'भारत का
राष्ट्रपति' चुना गया था और इन्हें 25 जुलाई
2002 को संसद भवन के अशोक कक्ष में
राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई गई। इस
संक्षिप्त समारोह में प्रधानमंत्री अटल
बिहारी वाजपेयी, उनके मंत्रिमंडल के सदस्य
तथा अधिकारीगण उपस्थित थे। इनका
कार्याकाल 25 जुलाई 2007 को समाप्त हुआ।
भारत के अब तक के सर्वाधिक लोकप्रिय व
चहेते राष्ट्रपतियों में से एक डॉ. अबुल पाकिर
जैनुलआब्दीन अब्दुल कलाम ने तमिलनाडु के एक
छोटे से तटीय शहर रामेश्वरम में अखबार बेचने से
लेकर भारत के राष्ट्रपति पद तक का लंबा
सफर तय किया है। पूर्व राष्ट्रपति अवुल पकिर
जैनुल्लाब्दीन अब्दुल कलाम को पूरा देश
एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से जानता था।
वैज्ञानिक और इंजीनियर कलाम ने 2002 से
2007 तक 11वें राष्ट्रपति के रूप में देश की सेवा
की। मिसाइल मैन के रूप में प्रसिद्ध कलाम देश
की प्रगति और विकास से जुड़े विचारों से भरे
व्यक्ति थे।
एपीजे अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931
को दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु के
रामेश्वरम में हुआ। पेशे से नाविक कलाम के
पिता ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे। ये मछुआरों
को नाव किराये पर दिया करते थे। पांच भाई
और पांच बहनों वाले परिवार को चलाने के
लिए पिता के पैसे कम पड़ जाते थे इसलिए
शुरुआती शिक्षा जारी रखने के लिए कलाम
को अखबार बेचने का काम भी करना पड़ा।
आठ साल की उम्र से ही कलाम सुबह 4 बचे उठते
थे और नहाकर गणित की पढ़ाई करने चले जाते
थे। सुबह नहाकर जाने के पीछे कारण यह था
कि प्रत्येक साल पांच बच्चों को मुफ्त में
गणित पढ़ाने वाले उनके टीचर बिना नहाए
आए बच्चों को नहीं पढ़ाते थे। ट्यूशन से आने के
बाद वो नमाज पढ़ते और इसके बाद वो सुबह
आठ बजे तक रामेश्वरम रेलवे स्टेशन और बस अड्डे
पर न्यूज पेपर बांटते थे।
कलाम ‘एयरोस्पेस टेक्नोलॉजी’ में आने के
पीछे अपनी पांचवी क्लास के टीचर
सुब्रह्मण्यम अय्यर को बताते थे। वो कहते हैं,
‘वो हमारे अच्छे टीचर्स में से थे। एक बार
उन्होंने क्लास में पूछा कि चिड़िया कैसे
उड़ती है? क्लास के किसी छात्र ने इसका
उत्तर नहीं दिया तो अगले दिन वो सभी
बच्चों को समुद्र के किनारे ले गए, वहां कई
पक्षी उड़ रहे थे। कुछ समुद्र किनारे उतर रहे थे
तो कुछ बैठे थे, वहां उन्होंने हमें पक्षी के उड़ने के
पीछे के कारण को समझाया, साथ ही
पक्षियों के शरीर की बनावट को भी
विस्तार पूर्वक बताया जो उड़ने में सहायक
होता है। उनके द्वारा समझाई गई ये बातें मेरे
अंदर इस कदर समा गई कि मुझे हमेशा महसूस
होने लगा कि मैं रामेश्वरम के समुद्र तट पर हूं
और उस दिन की घटना ने मुझे जिंदगी का
लक्ष्य निर्धारित करने की प्रेरणा दी। बाद
में मैंने तय किया कि उड़ान की दिशा में ही
अपना करियर बनाऊं। मैंने बाद में फिजिक्स
की पढ़ाई की और मद्रास इंजीनियरिंग
कॉलेज से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में
पढ़ाई की।’
1962 में कलाम इसरो में पहुंचे। इन्हीं के प्रोजेक्ट
डायरेक्टर रहते भारत ने अपना पहला स्वदेशी
उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 बनाया।
1980 में रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा
के समीप स्थापित किया गया और भारत
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष क्लब का सदस्य बन
गया। कलाम ने इसके बाद स्वदेशी गाइडेड
मिसाइल को डिजाइन किया। उन्होंने
अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलें भारतीय
तकनीक से बनाईं। 1992 से 1999 तक कलाम
रक्षा मंत्री के रक्षा सलाहकार भी रहे। इस
दौरान वाजपेयी सरकार ने पोखरण में दूसरी
बार न्यूक्लियर टेस्ट भी किए और भारत
परमाणु हथियार बनाने वाले देशों में शामिल
हो गया। कलाम ने विजन 2020 दिया। इसके
तहत कलाम ने भारत को विज्ञान के क्षेत्र में
तरक्की के जरिए 2020 तक अत्याधुनिक करने
की खास सोच दी गई। कलाम भारत सरकार
के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे।
1982 में कलाम को डीआरडीएल (डिफेंस
रिसर्च डेवलपमेंट लेबोरेट्री) का डायरेक्टर
बनाया गया। उसी दौरान अन्ना
यूनिवर्सिटी ने उन्हें डॉक्टर की उपाधि से
सम्मानित किया। कलाम ने तब रक्षामंत्री
के वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. वीएस
अरुणाचलम के साथ इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल
डेवलपमेंट प्रोग्राम (आईजीएमडीपी) का
प्रस्ताव तैयार किया। स्वदेशी मिसाइलों के
विकास के लिए कलाम की अध्यक्षता में एक
कमेटी बनाई गई।
इसके पहले चरण में जमीन से जमीन पर मध्यम
दूरी तक मार करने वाली मिसाइल बनाने पर
जोर था। दूसरे चरण में जमीन से हवा में मार
करने वाली मिसाइल, टैंकभेदी मिसाइल और
रिएंट्री एक्सपेरिमेंट लॉन्च वेहिकल (रेक्स)
बनाने का प्रस्ताव था। पृथ्वी, त्रिशूल,
आकाश, नाग नाम के मिसाइल बनाए गए।
कलाम ने अपने सपने रेक्स को अग्नि नाम
दिया। सबसे पहले सितंबर 1985 में त्रिशूल फिर
फरवरी 1988 में पृथ्वी और मई 1989 में अग्नि
का परीक्षण किया गया। इसके बाद 1998 में
रूस के साथ मिलकर भारत ने सुपरसोनिक क्रूज
मिसाइल बनाने पर काम शुरू किया और
ब्रह्मोस प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की
गई। ब्रह्मोस को धरती, आसमान और समुद्र
कहीं भी दागी जा सकती है। इस सफलता के
साथ ही कलाम को मिसाइल मैन के रूप में
प्रसिद्धि मिली और उन्हें पद्म विभूषण से
सम्मानित किया गया।
कलाम को 1981 में भारत सरकार ने देश के
सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्म भूषण और
फिर, 1990 में पद्म विभूषण और 1997 में भारत
रत्न प्रदान किया। भारत के सर्वोच्च पर पर
नियुक्ति से पहले भारत रत्न पाने वाले कलाम
देश के केवल तीसरे राष्ट्रपति हैं। उनसे पहले यह
मुकाम सर्वपल्ली राधाकृष्णन और जाकिर
हुसैन ने हासिल किया।
हमने सिर्फ एक पूर्व राष्ट्रपति, एक मिसाइलमेन, एक वैज्ञानिक व एक समाजसेवी नहीं खोया है...हमने आज विज्ञान का पूरा एक दौर खो दिया है। अब्दुल कलाम समस्त युवा पीढ़ी के लिए एक अभिभावक जैसे थे जिन्होंने हमेशा अपने ज्ञान से एक पथ-प्रदर्शक की भूमिका निभाई।
।। महान राष्ट्रपति अब्दुल कलाम साब को भावभीनी श्रधांजलि।।
।। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे ।।
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Saturday, 18 July 2015

Kaise Google+ Profile Ka Name Change Karenge ?


How To Change Google+ profile name ?

So, you want to change your name on Google Plus? You can easily change your Google+ profile name on Android, iPhone/iPad app,Computer- Pc.
Changing your name on Google+ will change it in all Google products like YouTube, Gmail and Google Wallet.Change my "personal name" for my Google Account.
  • Android app
  1. Open the Google+ app
    .
  2. At the top of the screen, touch your picture.
  3. Touch the menu > Edit name.
  4. Type your preferred name.
  5. In the upper-right corner, touch Save.
  • iPhone/iPad app
  1. Open the Google+ app .
  2. In the upper-left corner, touch the menu
    .
  3. At the top of the screen, touch your picture.
  4. In the upper-right corner, touch the settings > Edit name.
  5. Type your preferred name
  6. In the upper right corner, touch Save.
  • Computer- Pc
  1. Open Google+.
  2. In the top-left corner, click the drop-down menu > Profile .
  3. Click your name, and type your preferred name.
  4. In the lower-right corner, click Save
  5. Mor Information Click >>
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